ले एक दिन और बीत गया. वक्त को तो चलना है, चलेगा ही. आदमी गिनता रहे जिंदगी के पल-छिन. करता रहे हिसाब-किताब. बिठाता रहे जिंदगी का गणित. रोजी-रोटी की कीला-कांटी में गुजार दे जिंदगी. वक्त को तो आगे बढ़ना ही है. तो उसकी चिंता क्या की जाए. वैसे आज का दिन कुछ खास नहीं रहा. जिंदगी रोजमर्रा के तनाव के साथ ही आरंभ हुई थी. तनाव या डर. कभी-कभी हम कुछ नहीं जानते. डरे-डरे रहते हैं. डर से भागने, बचने का कोई रास्ता भी हमारे पास नहीं. अपने भीतर मौजूद डर को कम करने के लिए हम सामाजिक-आर्थिक स्तर पर कई व्यवस्थाएं की गई हैं. जैसे कि धर्म. घर्म हमारे मन में मौत के डर की व्युत्पत्ति है. भय बिनु होय न प्रीत कहते समय तुलसीदास का अपना डर ही बोल रहा था. मौत से जूझने, मृत्यु के बाद भी बने रहने की कामना ने धर्म को जन्म दिया है. धर्म दवा रही होगी, आरंभ में. जब वह कबीलाई संस्कृति का हिस्सा था. पर धीरे-धीरे धर्म खुद ताकत का प्रतीक बनता गया. दवा खुद मर्ज बन गई. धर्म के साथ जुडे़ धंधे बाजो ने इसको खुद एक मर्ज बना दिया. अब समय-समय पर इसकी ओवरहांलिग की जाती है. मगर जब ईश्वर की नियति भी मरना ही है तो धर्म को क्यों चिरंतन और अविनाशी माना जाए! फिर भी लोग मानते हैं. इसलिए नहीं कि वे बहुत श्रद्धालु हैं. बल्कि इसलिए कि वे न तो अपने मन के डर को निकालना चाहते है. न धर्म के धंधे को ही समझना चाहते हैं. ऐसे लोगों के लिए वक्त सरीसृप है. जिसको बिना आहट किए रेंगकर आगे बढ़ जाना है. डरा हुआ आदमी ही भगवान को भजता है.
कल, 15 दिसंबर को देवेश ने साहित्य अकादमी आने का निमंत्रण दिया. कहा कि परिसंवाद है. ‘मैंने बालसाहित्य क्यों लिखा?’ या ‘मैं बालसाहित्य क्यों लिखता हूं? कुछ ऐसा ही. पर अकादमी का नया-नया बना सभागार देखकर मन क्षोभ से भर गया. अंग्रेजों की शैली के दरवाजे. अपनी ऊंचाई से आदमी को उसके बौनेपन का एहसास कराते हुए. ऐसा कारपोरेट जगत में तो होता है. वहां पूंजी के आगे आदमी की अपनी ऊंचाई कोई मायने नहीं रखती. मगर साहित्य में तो ऐसा नहीं है. वह तो आदमी के अस्मिता की लड़ाई खुद लड़ता है. साहित्य अकादमी जैसी जगह पर ऐसी संरचना होने का अतिप्राय है कि हमने विलासिता और फिर उसके बहाने भ्रष्टाचार को भी आत्म सात कर लिया है. ऐसी जगह मौलिक चिंतन या लेखन हो भी कैसे सकता है. और जब यह संभव नहीं तो मौलिक विमर्श की संभावना अपने आप ही समाप्त हो जाती है.
वक्ताओं में हिंदी का प्रतिनिधित्व दिविक रमेश कर रहे थे. कुछ लोग अपने पद के आगे ऐसे संस्थानों में बुला लिए जाते हैं. दिविक जी भी ऐसे ही बुलाए गए होंगे. वे बोले. इसलिए कि बोलते रहना उनका काम है. आजकल प्रधानाचार्य हैं, सो बिना पढे़ बोलकर भी काम चलाया जा सकता है, यह उनके वक्तव्य ने सिद्ध कर दिया. उन्होंने ‘कला जीवन के लिए या जीवन कला लिए’ जैसी पुरानी बहस को उखाड़ने की असफल-सी कोशिश की. आशय था कि प्रतिबद्ध लेखक रचनात्मक साहित्य लिख ही सकता. मन हुआ कि उन्हें बताऊं कि साहित्य तो खुद एक प्रतिबद्धता है. पर क्या यह बात वे समझते नहीं, या समझना नहीं चाहते….बहरहाल!
प्रस्तुति: ओमप्रकाश कश्यप
डर
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