कल कश्यप जी ने सूचना दी कि उन्होंने अद्यतन का आरंभ कर दिया है, जिसके अंतर्गत हम दोनों को संयुक्त रूप से ब्लॉग डायरी लिखनी है। लेकिन मन बड़ा खिन्न था। 16 दिसंबर को किताबघर प्रकाशन, दिल्ली द्वारा आर्य स्मृति सम्मान दिए जाने का आयोजन त्रिवेणी सभागार, मंडी हाउस में रखा गया था। ‘शोध प्रबंध’ और ‘मीडिया एवं हिन्दी साहित्य’ विषय पर लिखे लेखों के लिए दो वर्षों के सम्मान एक साथ दिए जाने थे। पुरस्कृत शोध छात्रा का रटा हुआ कृत्रिम-सा भाषण सुनकर मन में संदेह जगा कि क्या वाकई उसका प्रबंध श्रेष्ठ होगा।
‘मीडिया और हिन्दी साहित्य’ विषय पर लिखे आलेखों के लिए चौदह निबंधकारों को पुरस्कृत किया गया था। लेकिन उनका सम्मान जिस अपमानजनक ढंग से किया गया, उस पर निश्चय ही ऐतराज किया जाना चाहिए। कार्यक्रम की समाप्ति की घोष्ाणा के पश्चात परिवार सहित आमंत्रित सभी पुरस्कार विजेताओं को, जिनमें कृष्णदत्त पालीवाल और सूर्यप्रसाद दीक्षित जैसे प्रकांड विद्वान और मेरे मित्र ओमप्रकाश कश्यप भी शामिल थे, को एक पंक्ति में खड़ाकर बिना किसी परिचय-प्रशस्ति के लिफाफे पकड़ा दिए गए। और तो और कार्यक्रम के आरंभ में जब पुरस्कृत आलेखों के संकलन का विमोचन किया गया, तब भी पुरस्कार विजेताओं के नामों की घोषणा नहीं की गई, जबकि उसके संपादक राजकिशोर का खूब गुणगान किया गया। यह भी आपत्ति का विषय है कि पुस्तक में पुस्तक के संपादक का तो फोटो सहित विस्तृत परिचय छापा गया है, लेकिन जिन पुरस्कृत लेखकों की मेहनत से यह पुस्तक संभव हुई, उनका परिचय छापने की जहमत नहीं उठाई गई। उनके परिचय परिशिष्ट में छापे जाते तो निश्चय ही यह अच्छी बात होती। मुझे लगता है कि पुरस्कृत लेखक और उनके परिवारीजन किताबघर जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान के इस व्यवहार से निश्चय ही आहत हुए होंगे, लेकिन प्रश्न यह है कि हिन्दी का लेखक समाज और मीडियाकर्मी, जो बड़ी संख्या में वहॉं उपस्थित हुए थे, उनकी प्रतिक्रिया क्या है और कहॉं किस रूप में दर्ज हो रही है।
प्रस्तुति : देवेन्द्र कुमार देवेश

लेखकों का ऐसा अपमानजनक सम्मान निश्चय ही आपत्ति का विषय है। मीडिया और लेखक बिरादरी में इसके विरोध में आवाज उठाई जानी चाहिए।