गाजियाबाद में भीड़ है, अराजकता है, प्रदूषण है, चोरी-डकैती-छीना-झपटी-मारपीट और अशांति है. बिजली यहां मनमाने तरीके से आती है. यही हाल पानी तथा अन्य नागरिक सुविधाओं का है. ऐसा कुछ नहीं है जो इसे विश्वस्तरीय तो क्या राष्ट्र-स्तरीय भी बनाता हो. फिर भी पूरा मीडिया इसे ‘हा॓ट सिटी’ मनवाने का जतन करता रहता है. लोग चाहे माने या न माने, मीडिया उनको मनवाने पर तुला रहेगा. इसलिए कि उसको प्रापर्टी डीलरों, बैंकों, भू-माफियाओं तथा अन्य रास्तों से अनतोल पैसा और विज्ञापन प्राप्त होते हैं. और इस व्यवस्था में जिस रास्ते से पैसा आए, वह जायज है. पहले प्यार और युद्ध में सबकुछ जायज माना जाता था. अब युद्ध दुश्मन को मैदान में नहीं, आर्थिक मोर्चे पर फतह करने के लिए लड़े जाते हैं. प्यार में जीवनसाथी का “स्टेटस” देखा जाता है. इसलिए मीडिया का सूत्र वाक्य ‘पैसे के लिए सबकुछ जायज है’ तक सिमट गया लगता है.
गाजियाबाद ‘हा॓ट सिटी’ संभवतः इसलिए है कि यहां दिल्ली और पड़ोस के नोएडा से लगभग आधे दामों पर रहने को आशियाना मिल जाता है. इसलिए मध्यम और निम्नवर्गीय लोग सिर पर छत की तलाश में गाजियाबाद का रुख करते हैं. ऐसे लोगों को आकर्षित करने, दीनताबोध से बचाए रखने के लिए ही ‘हा॓ट सिटी’ जैसे प्रलोभन या मिथक गढ़े जाते हैं. इन्हें अंजाम देने वाला भू-माफिया है, अब सरकार को भी वही कमाई का साधन नजर आता है. इसलिए किसानों से औने-पौने भाव जमीन खरीदकर उन्हें बिल्डरों और तथाकथित डेवलपरों को बेचा जाता है. सेक्टर रेट बढ़ाने और स्टांप डयूटी द्वारा अधिक से अधिक राजस्व बटोर लेने की कवायदें की जाती हैं. पहले रजिस्ट्री कराने के लिए दबाव बनाया जाता है और फिर यह सिद्ध करने के लिए कि रजिस्ट्री के समय आपने निर्धारित स्टांप-शुल्क का भुगतान किया था अथवा नहीं, नोटिस भेजकर स्टांप आयुक्त के दफ्तर के चक्कर कटवाए जाते हैं.
मेरे ही एक मित्र है. नौकरी से जैसे-तैसे बचाकर एक सरकारी का॓लोनी में प्ला॓ट खरीद लिया. पांच वर्ष के लिए निर्धारित किश्तों का भुगतान करने में नौ वर्ष लग गए. रजिस्ट्री कराकर घर आए तो लगा कि जिंदगी की जंग जीत चुके हों. घर बनाना तो एकाएक संभव नहीं था, बस सपना देखा करते थे कि एक दिन उस प्ला॓ट पर अपना भी ‘हवामहल’ होगा. एक दिन अचानक एक नोटिस देखकर दिल बैठ-सा गया. स्टांप आयुक्त ने लिख भेजा था कि आपने फलां तारीख को रजिस्ट्री कराई थी. उसमें स्टांप शुल्क में चोरी का अंदेशा लगता है. कार्यालय में आकर खुद को निर्दोष सिद्ध करें नहीं तो….फलां-फलां अधिनियम के तहत कार्रवाही की जाएगी.
बेचारे, बुरा न मानिए श्रीमान, आम आदमी बेचारा ही होता है, मन में डर लिए वे तारीख पर हाजिरी देने पहुंचे तो ‘साहब’ खुद नदारद थे. तारीख लगाई जा चुकी थी. मित्र ने अगली तारीख पर पहुंचकर बताया कि सरकारी महकमे से जमीन खरीदी गई है. विभाग ने जितना कहा उतने स्टांप शुल्क का भुगतान किया गया है. इसपर मित्र से कहा गया कि हम कुछ नहीं जानते. यदि सरकारी विभाग से आवंटित है तो वहां से लिखवाकर लाओ. मित्र ने लाख कहा कि आवंटनपत्र से लेकर कब्जापत्र तक सारे दस्तावेज उनके पास हैं. रजिस्ट्री में भी विक्रेता की जगह अमुक सरकारी कार्यालय का नाम चढ़ा है. पर उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई. बहरहाल, अगली तारीख पर उन्होंने सरकारी विभाग का प्रमाणपत्र भी उपलब्ध करा दिया. फिर भी अभी तक नोटिस से पीछा नहीं छूटा है. बताया गया है कि उनकी तरह सैकड़ों लोग हैं, जिन्हें विभाग द्वारा बिना यह जांच किए कि रजिस्ट्री कराने वाला व्यक्ति मूल आवंटी है या रीसेल में जमीन खरीदने वाला, नोटिस थमा दिए गए हैं. होना तो यह चाहिए था कि स्टांप आयुक्त का कार्यालय संबंधित विभाग से आवंटियों की सूची मंगाकर पहले जांच करता, फिर दोषी व्यक्तियों को ही नोटिस भेजता. लेकिन अगर ऐसा होता तो बाबुओं और वकीलों को निर्दोष व्यक्तियों से पैसे ऐंठने का अवसर कहां मिल पाता! दोषी व्यक्तियों को तो वकील लोग झूठे-सच्चे शपथपत्र लगवाकर नोटिस की मार से बचने का उपाय बता रहे हैं. पर जो निर्दोष हैं, वे क्या करें? ‘हाट सिटी’ में सरकारी विभाग किस लचर ढंग से काम करते हैं और इससे आम जनता को कितनी परेशानी और नुकसान उठाना पड़ता है, यह उसका छोटा-सा नमूना है.
आयुक्त कार्यालय का चक्कर काटने वालों में दिल्ली और हरियाणा के लोग भी सम्मिलित हैं. ‘उत्तर प्रदेश में तो यही चलता है’ कहकर अब वे अपनी भड़ास निकालते हैं. उस समय प्रदेश के लोगों पर क्या गुजरती है, यह सोचने की फुर्सत कम से कम उत्तर प्रदेश सरकार को तो नहीं है. प्रशासन यदि थोड़ी-भी सूझबूझ से काम ले तो इस छवि को सुधारा जा सकता है.
ओमप्रकाश कश्यप
अराजकता
Filed under आपबीती-जगबीती

great
सुन्दर लेखन, बधाई
सुन्दर आलेख । आभार ।