जिस व्यक्ति ने गाजियाबाद को सबसे पहले हा॓ट सिटी का नाम दिया, वह जरूर दूरंदेश और मीडिया-जगत का चतुर खिलाड़ी रहा होगा. स्पर्धा के इस युग में किसी नाम को चलाने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता. कौन-कौन से पापड़ नहीं बेलने पड़ते. मगर उस भले आदमी की काबलियत देखिए कि उसने एक नाम दिया और पूरे देश ने उसको अपना लिया. यह मीडिया की अंदरूनी एकता का, जो ऊपर से गलाकाट प्रतियोगिता दर्शाती है, मगर भीतर ही भीतर अनेक मुद्दों पर आम सहमति रखती है, नायाब नमूना है.
अब जैसे कि मीडिया इस तथ्य को छिपाए रहा कि शहर की बाकी कीमतें वहां की संपत्ति के दाम पर निर्भर रहती हैं. यदि किसी शहर की संपत्ति की कीमतों में निरंतर वृद्धि हो रही है तो समझ लीजिए कि वहां आम आदमी का रहना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. हालांकि लोग हा॓ट सिटी के इस मिथकत्व को समझने लगे है. जानने लगे हैं कि यह महज एक छलावा है. इसका मतलब सुविधाओं का विस्तार तो हरगिज नहीं है. बल्कि उन्हें इसकी कीमत जनसुविधाओं के अभाव और उनकी बढ़ती कीमतों के रूप में चुकाना पड़ सकता है.
हा॓ट सिटी गाजियाबाद की ढेरों समस्याएं हैं. मगर ट्रेफिक समस्या सबसे बड़ी है. नगर का पूरा का पूरा ट्रेफिक निजी वाहनों पर निर्भर है, जिसपर स्थानीय प्रशासन का कोई अंकुश नजर नहीं आता. बात यातायात नियमों के उल्लंघन और यात्रियों के साथ बदसलूकी तक सीमित नहीं है, इन स्थितियों के तो हा॓ट सिटी के नागरिक लगभग अभ्यस्त हो चले हैं. जब चाहे तब किराया बढ़ाने में भी आ॓टो चालकों की ही चलती है. प्रशासन का इसमें कोई अंकुश दिखाई नहीं पड़ता. तीन सवारियों के लिए बने आ॓टो में छह-सात सवारियों का बिठाया जाना आम बात है. चौराहों पर खड़ी यातायात पुलिस आंखें मूंदे रहती है. आ॓टो चालकों की बात माने तो वे पुलिस के आंख-कान बंद रखने के लिए हर महीने निश्चित रकम देते हैं. ऊपर से पुलिसवाले फोकट में सवारी गांठते हैं. इससे बचने के लिए वे सड़क किनारे खड़े सिपाही को देखते ही आ॓टो दौड़ाने लगते हैं. अब इससे दुर्घटना की संभावना बढ़ती है तो बढ़े.
पिछले दिनों नगर बस चलाने के लिए निजी बस आ॓परेटरों को आमंत्रित किया. खबर है कि लाइसेंस फीस कम करने पर भी निजी आ॓परेटरों की इस मामले में रुचि नहीं है. उत्तर प्रदेश सरकार की जो आर्थिक स्थिति है, उसमें सरकार निश्चय ही इस स्थिति में नहीं होगी, जो दिल्ली परिवहन निगम की तरह बसें चला सके. फिर अधिकारियों की लूट और काहिली के चलते दिल्ली परिवहन निगम जिस तरह घाटे का सौदा बन चुका है, उस तरह का नया ढांचा खड़ा कर देना, जब तक कि उसको ढंग से चलाए जाने का भरोसा न हो, कोई समझदारी भरा कदम नहीं जान पड़ता. तब निदान क्या है? क्या यह मान लेना चाहिए कि शहर की जनता को आ॓टो चालकों की मनमानी और उनसे होने वाले प्रदूषण को झेलने के अलावा अन्य कोई रास्ता ही नहीं है? एक रास्ता है, पर वह थोड़ा लंबा और मशक्कत-भरा हो सकता है. इसके लिए थोड़ा धैर्य, रचनात्मकता और दूरदर्शिता की जरूरत होगी.
हमारा इजराइल से दोस्ताना संबंध है. हम उससे हथियार खरीदने, आतंकवाद से लड़ने के तरीकों की प्रेरणा भी लेते रहे हैं. नगर-परिवहन एक और क्षेत्र है जहां वह छोटा-सा देश हमें राह दिखा सकता है. आज भी इजराइल की सबसे बड़ी बस सेवा सहकारिता के सिद्धांत पर आधारित है. वहां ‘एग्ड’ और ‘डेन’ नाम की दो सहकारी समितियां पूरे देश में बस यातायात सुविधाएं प्रदान करती हैं. ‘एग्ड बस को-आ॓परेटिव’ न केवल इजराइल की, बल्कि विश्व में सहकारिता द्वारा संचालित सबसे बड़ी बस सेवा है. समिति के बेड़े में 3105 बसें हैं, जिनमें 114 बुलेटपू्रफ बसें भी सम्मिलित हैं. ये बसें पूरे इजरायल में 1,038 नियमित तथा 3,984 वैकल्पिक मार्गों पर आवागमन करती हैं. प्रतिदिन 44,957 नियमित ट्रिप के दौरान वे दस लाख से अधिक यात्रियों को लाने-जाने का काम करती हैं और इस बीच 8,10,519 किलोमीटर की यात्रा करती हैं. समिति के नियमित कर्मचारियों की संख्या 6,214 है.
नागरिक सुविधाएं प्रदान करना सहकारिता के लिए नया नहीं है. अमेरिका जैसे देश में विद्युत प्रचालन का कार्य सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है. फिनलेंड में कंप्यूटर हार्डवेयर और सा॓फ्टवेयर का काम सहकारी समितियां देखती हैं. यहां तक कि वहां पर संगीतकारों की भी सहकारी समितियां हैं. साम्यवादी रूस में वकीलों के सहकारी संगठन हैं. इजरायल में ही महिलाओं की एक बड़ी सहकारी समिति है, जो घरेलू नौकरानियों की आपूर्ति का काम देखती है.
इन सबकी देखादेखी क्या गाजियाबाद क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जो भी आ॓टो चालक नया आ॓टो खरीदना चाहते हैं, प्रशासन उन्हें मिल-जुलकर एक साधारण बस या छोटी बस खरीदने के लिए प्रेरित करे. जरूरत पड़े तो उनको सहकारिता का प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है. एक मिनी बस आराम से सात-आठ व्यक्तियों को रोजगार दे सकती है. सात-आठ आ॓टो की कीमत में वह आसानी से तैयार भी हो सकती है. प्रशासन और बैंक की मदद से यह काम और भी संभव और सुविधाजनक हो सकता है.
हा॓ट सिटी की एक और खबर चौंकाने वाली है. हाल ही में समाचार आया कि यहां की मधुबन के नाम से बन रही कालोनी में विधायकों को प्ला॓ट दिए जाएंगे. कुल चार सौ प्लाॅट में से करीब 170 विधायकों के नाम आरक्षित होंगे, इससे पहले इंद्रापुरम में भी जीडीए विधायकों को प्ला॓ट दे चुका है. जब विधायक प्ला॓ट लेंगे तो बड़े अधिकारी कैसे चुप रहने वाले हैं. झूठ-बेईमानी या किसी भी तरह, किसी न किसी रूप में वे भी प्ला॓ट कब्जाएंगे ही. आम जनता को आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने के नाम पर किसानों से ली गई जमीन की यह सरकारी लूट भी हा॓ट सिटी की संस्कृति का हिस्सा बनती जा रही है….इस चंगुल से तो जागरूक जनता ही बाहर निकाल सकती है.
ओमप्रकाश कश्यप
