दलित विमर्श

बीसवीं सदी के अंत तक दलित वर्ग तथाकथित सभ्‍य समाज में सर उठाकर खुद को दलितवर्गीय कह सकने की हिम्‍मत नहीं करता था, कहीं उसे अपमानित न होना पड़े-लेकिन आज का दलित अपनी पहचान के लिए, अपने स्‍वाभिमान के लिए, सर उठाकर, सीना तानकर संघर्ष कर रहा है, तथापि उसके मन का ग्‍लानि भाव उसको अपनी ही नजरों में शर्मसार करता रहता है-हाय, क्‍यों पैदा हुआ मैं दलित बनकर।

इस संदर्भ में मुझे अपने पिता श्री जुगेश्‍वर प्रसाद के ये विचार याद आते हैं, जिन्‍हें वे विमर्श के दौरान प्राय: लोगों के बीच रखा करते हैं-वर्ण व्‍यवस्‍था द्वारा निर्धारित कर्मों अनुसार विचार करें तो ब्राह्मण-वर्ण की कर्तव्‍य-च्‍युति का नतीजा यह है कि आज भी हमारे देश की आधी जनता अनपढ़ है, क्षत्रियों की कर्तव्‍य-च्‍युति का नतीजा यह रहा कि देश को सैकड़ों-हजारों वषों की गुलामी में जीवन-बसर करना पड़ा और वैश्‍य वर्ण के हाथों व्‍यापार मानों कभी रहा ही नहीं-फिर भी वे गौरवान्वित हैं, अपने को उच्‍च कहते नहीं अघाते, फिर शूद्र और िदलित कही जानेवाली मेहनतकश और कलाकार जातियॉं क्‍यों शर्मिन्‍दा हैं-दुर्दान्‍त दमनचक्र और लाखों अपमान सहकर भी कर्तव्‍य-विमुख होने का कोई उदाहरण इनके खाते में नहीं, बल्कि किलों से लेकर गुहा-चित्रों तक और लोककला से उच्‍च शास्‍त्रीय कला तक के रूप में में उनकी कर्तव्‍य-परायणता के सबूत बिखरे पड़े हैं-जिनका हिस्‍सा बनने और जिनसे अपने को जोड़ने के लिए तथाकथित उच्‍चवर्णीय लोग भी लालायित रहे हैं। दरअसल दलितों को कर्तव्‍यनिष्‍ठा के अपने इतिहास के लिए गौरवान्वित होना चाहिए। यदि किसी को लज्जित होने की जरूरत है तो शर्म आनी चाहिए व्‍यवस्‍था के पुरोधाओं को कि उनकी तथाकथित आदर्श व्‍यवस्‍था में श्रम को उचित सम्‍मान और श्रमिक को उसके आधारभूत प्राप्‍य तक से वंचित रखा गया।

मुझे लगता है कि अपनी वा‍स्‍तविक स्थिति का बोध होने पर ही दलित वर्ग समाज, सत्‍ता और संस्‍कृति के खोखले आदर्शों को समझने तथा उनके विरुद्ध खड़ा होने में समर्थ हो सकता है। यह बोध ही उसे इस बात की प्रेरणा देखा कि वह उस षड्यंत्र की पड़ताल कर सके, जिसके तहत समाज के मेहनतकश किसान-मजदूर वर्ग को अंत्‍यज और शूद्र कहकर उपेक्षित, लांछित, प्रताडि़त और वंचित किया गया। शायद भारतीय साम्‍यवादी आंदोलन की उस कूटनीति को समझने की दिशा में भी कोई पहल हो, जिसके तहत पूरे भारत में शूद्र के रूप में साफ पहचाने जा सकनेवाले दलित, शोषित सर्वहारा वर्ग को उपेक्षित कर पूंजीवाद क अनुरूप वर्ग-निर्माण, उसकी पहचान और संगठन के छद्म संघर्ष में हमारी ऊर्जावान पीढि़यों की शक्ति जाया हुई।

प्रस्‍तुति : देवेन्‍द्र कुमार देवेश

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