मोबाइल फोन लोगों की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. लेकिन मैं इससे उतना अंतरंग नहीं हो पाया हूं. पता नहीं क्यों, मुझे यह हर बार अपनी एकाग्रता में खलल महसूस होता है. कभी-कभी तो इतना बेसुरा लगता है कि दिमाग भन्ना उठता है. हालांकि आज के संदर्भ में जब देश में बारह करोड़ मोबाइलधारक हों तथा चिट्ठियों-पत्रों की सारी जिम्मेदारी इन्हीं फोनों ने उठा रखी हो, ऐसे में उनकी उपेक्षा करना अशिष्ठता ही मानी जाएगी. मगर यह हकीकत है कि मैं अपने निकट मित्रों के मोबाइल भी काटता रहा हूं. यहां तक कि घंटी का लंबे समय तक बजते रहना या मोबाइल के बाइव्रेशन को बर्दाश्त कर पाना भी मुझसे नहीं हो पाता.
मैं जानता हूं कि यह गलत है. मित्रगण बुरा मानते होंगे. मैं उन सबके आगे क्षमाप्रार्थी हूं. पर मैं आदत छोड़ नहीं पाया हूं. छोड़ने का प्रयास किया है, एक-दो दिन सब ठीक-सा महसूस होता है. लगता है आदत पड़ जाएगी. कुछ दिनों के बाद में फिर वही अरुचि…
ऐसे में जब रविवार की शाम डा॓. हरिकृष्ण देवसरे का फोन आया तो मन प्रफुल्लित हो उठा. मेरी पीढ़ी के न जाने कितने लोग हैं जिनके पढ़ने-लिखने का संस्कार उनकी बालकहानियों को पढ़कर जन्मा है. हिंदी बालसाहित्य के क्षेत्र में पहले शोध प्रबंध की बात जाने दीजिए. वह नौकरी की लालसा के लिए एक नए विषय को चुनने की सुनीति का परिणाम भी हो सकता है. हालांकि नौकरी के लिए साहित्य का डा॓क्टर बनने के लिए जैसे शोधप्रबंध आजकल लिखे जाते हैं, वैसा काम डा॓. देवसरे ने बिलकुल नहीं किया है. हिंदी का पहला शोध प्रबंध होने के बावजूद उसमें इतनी गहराई है कि लगता है कि इतनी संभावनाओं के बावजूद यह क्षेत्र अछूता क्यों है? उनका शोध प्रबंध दर्शाता है कि सामग्री को जुटाने के लिए उन्होंने कितना श्रम किया होगा. उससे यह भी सिद्ध होता है कि उनका बालसाहित्य की ओर जाना कितने गंभीर सोच का परिणाम था. आगे एक सरकारी संस्थान की जमी-जमाई नौकरी छोड़ आना भी इसी समर्पण-भाव की एक कड़ी बना.
यह इसीलिए भी उल्लेखनीय है कि बालसाहित्य के क्षेत्र में देवसरे जी ने उस समय सोची-समझी दस्तक दी थी, जब कोई उसे गंभीरता से लेने को तैयार ही नहीं था. हालांकि हिंदी बालसाहित्य की परंपरा बहुत पुरानी थी. डा॓. रामनरेश त्रिपाठी, डा॓. श्रीधर पाठक, हरिऔध, पंत, दिनकर, निरंकारदेव सेवक आदि बच्चों के लिए बहुत सुंदर-सुंदर रचनाएं लिख रहे थे, उनसे पहले प्रेमचंद ने भी बालोपयोगी कहानियां लिखी थीं, तथापि वे जाने बड़ों के साहित्यकार के रूप में जाने जाते थे. स्वतंत्र बालसाहित्य की अवधारणा भी नहीं पनप पाई थी. आज यदि हिंदी बालसाहित्य प्रौढ़ हुआ है, उसमें विविधता और गहराई है. साहित्य अकादमी जैसा संस्थान बालसाहित्य पर स्वतंत्र परिसंवाद का आयोजन करता है, पत्रिकाएं उसपर विशेषांक निकालती हैं, तो इसमें डा॓. देवसरे जैसे बालसाहित्य को समर्पित व्यक्तित्व का बहुत बड़ा योगदान है.
इन दिनों वे थायराइड के प्रकोप से परेशान हैं. बढ़ती हुई बीमारी बार-बार अस्पताल ले जाती है. डाक्टरों ने स्टारायड खाने की सलाह दी है. दिन में भोजन से ज्यादा गोलियां खानी पड़ती हैं. मैं स्टारायड को ऐलोपैथी का प्रकोप मानता हूं. वे एक बीमारी का उपचार करते हैं, मगर शरीर के स्नायुतंत्र को बुरी तरह आहत करते हैं, कोशिकाएं फूलने लगती हैं. यहां तक कि सांस लेना भी दूभर हो जाता है. बहरहाल जो जीवन आजकल हम जी रहे हैं, उसमें इस संकट से मुक्ति नजर नहीं आती.
ऐसी विकट बीमारी के बावजूद एक साहित्यकार डा॓. देवसरे की जिजीविषा ही है जो भारी काया-कष्ट के बावजूद उन्हें रचनाधर्मिता से जोड़े रखती है. खुद अस्पताल के चक्कर काटते-काटते वे ‘जूतों का अस्तपाल’ जैसी मनोरंजक और शिक्षाप्रद बालकहानी बच्चों के लिए लिख जाते हैं. कहानी में वे बच्चों को बताते हैं कि शहरीकरण की मार हम मनुष्यों को ही नहीं झेलनी पड़ती, जूते भी उसका शिकार बनते हैं, आदमी की भागमभाग का बुरा असर उनपर भी पड़ता है.
महानगर में बीमारियों से महासमर करना हम सब की विवशता है.
उस दिन उनकी बातचीत से पता चला कि उनके पास बालसाहित्य के दिग्गजों के बड़े अविस्मरणीय अनुभव हैं. अगर ऎसा है तो उन्हें सहेजना किसी इतिहास को सहेजने जैसा पुण्यकार्य होगा. उनका अनुसंधान बालसाहित्य के क्षेत्र में अनेक संभावनाओं के द्वार खोल सकता है. बातों-बातों में यह भी महसूस हुआ कि बीमारी अच्छे-अच्छों को तोड़कर रख देती है, दिन-रात दवाएं खाते-खाते वे उकता चुके हैं. फिर भी हम चाहते हैं कि हमारे समय का यह दिग्गज बालसाहित्यकार अपनी जिजीविषा और रचनाधर्मिता को लंबे समय तक बनाए रखे.
तो चलिए नववर्ष के पहले दिन हम उनके लिए एक समिल्लित कामना करें…
जीवेतः शरद शतम्!
ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार डा॓. देवसरे की जिजीविषा के बारे में जानकर अच्छा लगा .. आपके और आपके परिवार के लिए भी नववर्ष मंगलमय हो !!