सहकारिता आंदोलन के उन्नायक : अठाइस महान बुनकर
इटली की एक कहावत है—जो धीरे चलते हैं, वे दूर तक जाते हैं. इस कहावत को सच कर दिखाया था, रोशडेल पायनियर्स ने. पूंजीवाद से उत्पीड़ित गरीब बुनकरों ने, जो संख्या में केवल अठाइस थे. उनका सपना था, मुक्ति का. उनका सपना था, अपनी राह अपने आप चुनने का. अपनी आधी से अधिक जिंदगी यूरोपीय पूंजीवाद को भेंट कर देने के बाद उनका सपना था, बाकी की जिंदगी में स्वाभिमान को बचाए रखने का. वे कोई बुद्धिजीवी नहीं थे, लेकिन अनुभव से तपे-तपाए थे. वे पूंजीपति भी नहीं थे, किंतु ईमानदारी और समर्पण जैसी अमूल्य निधियां उनमें से हरेक के पास थीं. वे निर्धन थे, परंतु संकल्प के धनी थे. वे भविष्यदृष्टा नहीं थे, मगर अपनी मेहनत और संकल्प के सुफल को देख लेने की दूरदृष्टि उनके पास थी. उन्हें संगठन चलाने का भी कोई अनुभव नहीं था, लेकिन दूसरों की सुनना और अपनी बात सलीके से रखना उन्हें भली-भांति आता था.
पूंजीवाद ने उन्हें सताया, उनके पूर्वजों को घर से बेघर किया, लेकिन पूंजी से उन्हें कोई वैर नहीं था. उन्हें वैर था पूंजीवाद और उसकी शोषणकारी मानसिकता से, जो सुरसा के मुंह के समान लगातार फैलता ही जा रहा था, जो मनुष्य की अस्मिता, उसके संस्कार, सभ्यता, संस्कृति और यहां तक कि उसकी पहचान को भी लीलता जा रहा था. भेड़िये के समान जिसके खूनी पंजे इंसानियत को दबोचने को आतुर थे. वे समझ चुके थे कि उनमें से किसी भी एकल शक्ति उस दानव का मुकाबला करने लायक नहीं है. हां, वे मिलकर कोई न कोई हल जरूर खोज लेंगे. इसलिए उन्होंने सहकार को चुना. उसके द्वारा वे चाहते थे—
‘अपनी संगठित-शक्ति द्वारा उस भेड़िये को मनुष्यता की चारदीवारी से बाहर खदेड़ देना.’1
वे चाहते थे पूंजीवाद का हृदय-परिवर्तन. चाहते थे कि वह खुद को बदले, नख-दंत त्यागकर मनुष्य-मात्र की अस्मिता का सम्मान करे…सबके कल्याण की सोचे…धन को तिजोरियों में बंद करने के बजाय जन-जन के काम लाए, इंसानियत निभाए. वे पूंजीवाद का आदर्श विकल्प दुनिया के सामने रखना चाहते थे, जिसमें धन-वैभव, सुख और समृद्धि हो, किंतु पूंजीवाद की एक भी बुराई न हो. न हो दर्प, न ऊंच-नीच का बोध, न धन-संपदा का कोरा अभिमान. आत्मनिर्भर बनना बनना उनका लक्ष्य था, शायद वैसी मजबूरी भी रही हो, इसलिए अपनी समस्याओं से खुद ही जूझने का संकल्प साध बैठे थे. लगभग उन्हीं दिनों ने राबर्ट पील का कहा था— ‘अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाओ’2 वही उन्हें प्रेरित कर रहा था. उनमें से हर एक न केवल अपनी, बल्कि पूरे समूह की जिम्मेदारी उठाने को संकल्पबद्ध था या अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के दिए दूसरों की जिम्मेदारियों में सहभागी बनना चाहता था.
उद्यम की शुरुआत के पूंजी अनिवार्य थी. लेकिन वह आए कहां से? गरीब मजदूरों को कर्ज भी कौन देता? देता भी तो कौन उसका ब्याज चुकाता? उसपर असफलता की संभावना भी डराती थी. आखिर इसका हल भी उन्होंने सोच लिया. वह भी सहकार की भावना के शत-प्रतिशत अनुकूल. गोया उस समय उनकी यह धारणा रही हो कि सहकार की शुरुआत ही करनी है तो वह पहले ही कदम से हो. संकल्प पहली ही सांस के साथ साधा जाए. जैसा हल उन्होंने सोचा था, वह दर्शाता था कि वह दूसरों से जैसे नहीं…अलग हैं सबसे. नियमानुसार उनमें से प्रत्येक प्रति सप्ताह एक-एक पैंस बचाता. वह रकम सुरक्षित रख ली जाती थी. मानो वह कोई यज्ञ था, जिसके लिए हर कोई अपनी ओर से समिधा डालने की तैयारी कर रहा था. हां, वह यज्ञ ही तो था. आत्मसम्मान, समानता, आत्मनिर्भरता, आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिकता की सुरक्षा के लिए किया जाने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र यज्ञ.
हर एक की ओर से एक पाउंड, यानी कुल अठाइस पाउंड रकम जुटाने में दो महीने से भी ज्यादा गुजर गए. बीच में मुश्किलें भी आईं, निराशा और हताशा भी. कई बार लगा कि उनका सपना बीच ही मैं बिखर जाएगा. जो संकल्प वे साधना चाहते हैं, उनकी क्षमता से परे है. पर रास्ते निकलते रहे. उसी मामूली कही जा सकने वाली रकम से उन्होंने एक उपभोक्ता स्टोर की शुरुआत की थी. उस समय उन्होंने सोचा भी न होगा कि उनका मामूली-सा प्रयास, जिसकी कामयाबी में उनमें से अधिकांश को अंदेशा ही रहा होगा, एक दिन पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायक सिद्ध होगा और इतना विस्तार लेगा कि कोई भी दूसरा आर्थिक आंदोलन उसका मुकाबला कर पाने में असमर्थ सिद्ध हो.
हम जान लें कि रोशडेल पायनियर्स पहली सहकारी संस्था नहीं थी. रोशडेल पायनियर्स से पहले डा॓. विलियम किंग, राबर्ट ओवेन आदि कई लोग सहकारी समितियों का गठन कर चुके थे. लेकिन वे सभी प्रयास नाकाम रहे थे. रोशडेल पायनियर्स में से एक चाल्र्स हावर्थ स्वयं भी एक सहकारी समिति का गठन कर चुका था, जो असफल सिद्ध हुई थी. उन्हीं अनुभवों से सबक लेते हुए रोशडेल पायनियर्स ने, पिछली कमियों को दूर करते हुए एक सहकारी समिति का गठन किया था. इस बार कठिन अनुशासन और ईमानदारी के कारण उन्हें कामयाबी भी प्राप्त हुई. कामयाबी भी ऐसी कि वर्षों तक रोशडेल पायनियर्स दुनिया-भर में सहकारिता आंदोलन का पर्याय बना रहा. उस समिति की सफलताएं दूसरी समितियों के लिए प्रेरणाएं बनीं. उनके द्वारा बनाए गए नियमों पर आगे चलकर यह आंदोलन आगे बढ़ा और इतनी तेजी से आगे बढ़ा कि पूरी दुनिया में वैकल्पिक अर्थनीति का प्रतीक बन गया.
रोशडेल
इंग्लेंड के सीमावर्ती प्रांत स्का॓टलेंड से एक पठार-शृंखला आरंभ होती है, जो पूरे देश को बीचों-बीच दो हिस्सों में बांट देती है. इस सुदीर्घ पठार-शृंखला का नाम है—पेनी(Pennines). इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण इंग्लेंडवासी इसे कभी-कभी ‘इंग्लेंड की रीढ़’ भी कहते हैं. इसी पठार-शृंखला से रोश(Roch) नामक नदी निकलती है. रोश नदी के किनारे बसे होने के कारण ही उस कस्बे का नाम रोशडेल पड़ा था. वर्षों तक वह कस्बा ईसाइयों के प्राचीन धर्मस्थान के रूप में विख्यात रहा. प्राचीन रोशडेल महज एक गांव था, जहां पर किसान खेती किया करते थे. बाद में कोयले की खानों की खोज हुई तो बाहर से मजदूर वहां आने लगे, जिससे उसकी आबादी भी बढ़ने लगी. रोशडेल के कायाकल्प की वास्तविक शुरुआत अठारहवीं शताब्दी से हुई, जब मशीनीकरण का लाभ उठाते हुए पूंजीपतियों ने वहां बड़ी-बड़ी कपड़ा मिलें लगानी प्रारंभ कर दीं. रोश नदी के किनारे-किनारे कपड़ा बुनने के कई कारखाने लगाए गए, जिससे वह कस्बा कुछ ही समय में कपड़ा उद्योग के केंद्रीय स्थान के रूप में विख्यात हो गया. बावजूद इसके उनीसवीं शताब्दी के पांचवे दशक तक रोशडेल इंग्लैंड का एक मामूली कस्बा बना रहा. 1840 की जनगणना के अनुसार रोशडेल की आबादी थी मात्र 24423 और वहां का प्रमुख उद्योग था—वस्त्र निर्माण! मशीनीकरण से पहले रोशडेल में बेहतरीन बुनकर थे. एक से बढ़कर एक, हुनरमंद और बेमिसाल. कारीगर हाथ से महीन मलमल बुनते थे, जिसकी दूर-दूर तक मांग थी. जिंदगी ठीक-ठाक चल रही थी. मशीनें आईं तो सब चैपट होने लगा. वर्षों पुराने जमे-जमाए उद्योग उद्योग उजड़ने लगे. उनमें लगे कारीगर बेरोजगार होते चले गए. हाथ की दस्तकारी मशीनों की गुलाम बनने लगी. बेरोजगारी बढ़ी तो जीने की मुश्किलें भी पांव पसारने लगीं. यहां तक कि जीवन जीना कठिन हो गया. जब पेट भरने को ही कुछ न हो तो तन ढकने को कहां से आए! दूसरों के लिए कपड़ा बुनने वाले, उनका नंगापन ढकने वाले बुनकर स्वयं नंगे रहने लगे. मशीनें अपने मालिक की मनमानी भी साथ लाई थीं. जो अभी भी अपने धंधे को चलाने का संघर्ष कर रहे थे उनका हाल भी कम बुरा नहीं था. चारों ओर से मिलने वाली रिपोर्ट बताती थीं कि—
‘उनके (बुनकरों के) घर का सारा साज-सामान, फर्नीचर आदि बिक चुका था. पहनने को केवल चिथड़े नसीब होते थे. प्रतिदिन सोलह-सोलह घंटे लगातार मेहनत करने वाले कारीगरों का इतना बुरा हाल था कि उन्हें आलू, प्याज, शकरकंद, दलिया, शीरे जैसी चीजों के सहारे पेट भरना पड़ता था.3
मजदूर और कारीगर छोटे-छोटे गंदे और दड़बेनुमा घरों में रहते थे. उनकी बस्तियों में रहन-सहन बहुत शोचनीय था. सफाई व्यवस्था के अभाव में वे अनगिनत बीमारियों का ठिकाना बन चुकी थीं. गरीबी की मार, कारखाना मालिक उनसे दिन में सोलह से अठारह घंटे तक काम लेते थे—
‘कारखानों में न्यूनतम वेतन की कोई अवधारणा ही नहीं थी. इतने घंटे काम करने के बदले में उन्हें जो मजदूरी मिलती थी, उसे आज के हिसाब से देखा जाए तो प्रति सप्ताह मात्र दस पैंस.’4
दस पेंस में अठारह घंटे कार्य. कमरतोड़ परिश्रम. बिना किसी सुविधा, मान-सम्मान के. इतनी राशि उनके भोजन के लिए भी अपर्याप्त सिद्ध होती थी. ऊपर से कारखानों में गंदगी इतनी अधिक थी कि मजदूरों को कोई न कोई रोग हर समय लगा रहता था. सफाई का न तो कोई इंतजाम था, न कारखाना मालिकों का उसकी ओर ध्यान ही जाता था. उनका जोर तो इस बात पर था कि कैसे ज्यादा से ज्यादा बचत करके मुनाफे को बढ़ाया जाए. उल्टे इस प्रकार के सवाल उठाने वालों को नौकरी से बेदखल कर दिया जाता था. इसके लिए मजदूरों का खुलेआम शोषण होता था. अधिकांश फैक्ट्रियां बच्चों को काम में लगाए रखती थीं, जिन्हें बिना आराम के सोलह-सतरह घंटे लगातार काम करना पड़ता था. बीच-बीच में उन्हें मालिक की ओर से अक्सर चाय और सस्ते बिस्कुट मिलते. इसलिए नहीं कि भूख के कारण भोजन के रूप में वे उनकी जरूरत थे. महज इसलिए कि उन्हें खाकर उनकी कार्यक्षमता को किसी तरह बनाए रखा जाए. विशेष अवसरों पर जब काम की अधिकता होती तो मजदूरों को बिना आराम और अतिरिक्त मजदूरी के बीस-इकीस घंटे तक लगातार काम करना पड़ता था. और कभी-कभी तो रात-दिन काम में ही गुजार दिए जाते थे. कारखानों का वातावरण स्वास्थ्य के एकदम प्रतिकूल था, इस कारण मजदूरों को कोई न कोई रोग हमेशा घेरे रहता था. कई बार बिना उपचार के ही मजदूरों को जान से हाथ धोना पड़ता था—
‘ऊपर से प्रदूषण का बुरा हाल था. वह लगातार बढ़ता ही जा रहा था. सार्वजनिक सफाई व्यवस्था बेहद लचर थी. 1848 में रोशडेल की मजदूर बस्तियों में औसत आयु मात्र इकीस वर्ष थी, जो ब्रिटेन के उस समय के राष्ट्रीय औसत से छह वर्ष कम थी.5
यह कपड़ा मिलों में काम करने वाले उन मजदूरों का दुर्दशा थी, जिनके कारणा रोशडेल की मिलें पूरी दुनिया में अपनी उत्पादकता और अपने मालिकों के लाभ के लिए जानी जाती थीं. जिनके कारण पूरी दुनिया में इंग्लेंड की औद्योगिक प्रगति का डंका पिट रहा था. रोशडेल में स्त्रियों की अवस्था तो और भी दयनीय थी. पूरे मौसम उन्हें मात्र एक जोड़ी कपड़ों में रहना पड़ता था. कभी-कभी तो वे भी चिथड़े बनकर लटकने लगते. उनसे बदबू आती थी. खाली वक्त में स्त्रियां कपड़ों की जुएं बीनती या फिर चिथड़ों सींती रहतीं. विकट गरीबी के कारण अनेक औरतों को अधनंगे बदन ही रहना पड़ता था. हालत उस समय और भी दयनीय हो जाती थी, जब कोई स्त्री बच्चे को जन्म देती थी. उस समय—
‘अपने एकमात्र वस्त्रों को गंदगी से बचाने के लिए औरतें, बच्चे को जन्म देते समय अपने दोनों हाथ ऊपर उठा, दो अन्य औरतों के कंधों का सहारा लेकर खड़ी हो जाती थीं. उसी अवस्था में वे बच्चे को जन्म देती थीं. वे बुनकर जो अपनी बेमिसाल कारीगरी के पूरी दुनिया में जाने जाते थे, जो अपना पूरा जीवन पूरे संसार के लिए कपड़ा और बिस्तर आदि बुनने में लगा देते थे, उनके अपने शरीर पर फटे चिथड़े और बिस्तर पर गंदे तौलिये पड़े होते थे.6
वे एक-दूसरे से सटाकर बनाए गए, छोटे-छोटे झोपड़ीनुमा कमरों में रहते. ऐसे संकरे कि वहां हवा और धूप मुश्किल से जा पाती थीं. खुली नालियों में कीड़े गिजबिजाते रहते. मारे बदबू के वहां से गुजरना कठिन होता. ऐसी अवस्था में बचपन से ही रोग पाल लेना एकदम आम था. औरतों में जनन-संबंधी बीमारियां अक्सर रहतीं. प्रसूति के दौरान स्त्री का चल बसना साधारण बात थी. जन्म के समय बच्चे की जीवन संभाव्यता बहुत ही कम होती. अधिकांश जन्म लेते ही मर जाते. भरपाई के लिए स्त्रियां नए भ्रूण को गर्भ में ले आतीं. एक और मजदूर वर्ग की यह स्थिति थी, तो दूसरी ओर इंग्लैंड का सभ्रांत वर्ग अत्याधुनिक जीवनशैली का अभ्यस्त होता जा रहा था. उस वर्ग में विलासिता के प्रतीक, नए-नए शौक पनप रहे थे. ऐसी अवस्था में यह संभव ही था कि लोगों में अपनी स्थिति के प्रति आक्रोश पैदा हो, वे उससे उबरने के बारे में विचार करें. ध्यातव्य है कि पूंजीवादी शोषण से उबरने की छटपटाहट और आक्रोश की निकृष्ट अवस्था उन्हें अपराध की दुनिया में भी ढकेल सकती थी. लेकिन टूटन और घोर अभावों से भरी जिंदगी में ऐसे अवसर कम ही आते थे, जब मन में पल रहा आक्रोश विद्रोही बनकर ललकारने लगता था. उनमें से अधिकांश ईमानदार, दिल के भले, स्वावालंबी, कानून और न्याय-व्यवस्था में विश्वास रखनेवाले लोग थे. यही बात उनके पक्ष में सर्वाधिक जाती थी. परिस्थितियां उनके विपरीत थीं.
उनके पास हस्तशिल्प की समृद्ध परंपरा, संबंधों की गरमाहट, घनी सामाजिकता तथा सकारात्मक सोच था. वे अपनी स्वतंत्रता के प्रति सजग थे; दूसरों की आधिकारिता का सम्मान करना उनका स्वभाव बन चुका था. अपनी परंपराओं तथा सामाजिक तालमेल को बनाए रखने के लिए उनमें ईमानदार चाहत थी. अपनी एकता तथा संगठन शक्ति के बल पर वे सहकारी समिति के गठन के बजाय कुछ और प्रयास भी कर सकते थे, जैसे कि राजनीतिक शक्तियों के साथ तालमेल करके अपनी स्थिति में बदलाव के लिए कारखाना मालिकों पर दबाव बनाना. या फिर संसदीय ला॓बी बनाकर सरकार और प्रशासन को बाध्य करना कि वे कंपनी कानूनों में आवश्यक बदलाव लाकर श्रमिक-कल्याण के कार्यक्रमों को लागू करें. उनके लिए यह भी आसान था कि धार्मिक नेताओं, संघों अथवा चर्च की शरण में जाकर अपने पक्ष में माहौल बनाएं, ताकि सरकार और फैक्ट्री मालिक मजदूरों के हितों की ओर ध्यान दें. सरकार श्रमिक अधिकारों के पक्ष में आवश्यक कानून बनाए. मालिक अपने मुनाफे का एक हिस्सा श्रमकल्याण कार्यक्रमों पर खर्च करें. वे चाहते तो श्रमिकों के असंतोष का लाभ उठाते हुए उन्हें लंबी हड़ताल के लिए भी तैयार कर सकते थे; और इस बात की भी पूरी-पूरी संभावना थी कि उन्हें अपने लक्ष्य में सफलता ही मिलती. लेकिन उन्होंने इनमें से किसी भी रास्ते पर चलना स्वीकार नहीं किया. बल्कि अपनी परंपरा और ठोस इरादों के आधार पर ठोस कार्य करने के लिए स्वयं को तैयार कर लिया. इसका एक कारण यह भी है कि बदलाव के बाकी सभी उपायों को समय-समय पर आजमाया जा चुका था. शायद अठारहवीं शताब्दी की यह विशेषता भी थी वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नएपन और मौलिकता को आमंत्रित कर रही थी. ज्ञान के क्षेत्र में नए दर्शन का दर्शनों का उदय. विज्ञान के क्षेत्र में अधुनातन आविष्कार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नित-नए चमत्कार मानव सभ्यता को उस शताब्दी के ही उपहार थे. तर्काधारित सोच ने मनुष्य के पूरे जीवन-दर्शन को प्रभावित किया था. विलियम किंग, राबर्ट ओवेन, चार्ल्स फ्यूरियर उस विचारधारा को नई जमीन दे रहे थे. हालांकि उनके द्वारा प्रारंभ किए गए सहकारिता के सभी प्रयास असफल रहे थे. किंतु सहकार के सामर्थ्य और उसकी उपयोगिता पर उन सबका अखंड विश्वास बना हुआ था, बावजूद इसके कि उसको पूरी तरह आजमाया जाना बाकी था. समय उसकी रूपरेखा तैयार कर चुका था. उसके लिए जिस विवेक, धैर्य, समर्पण, दूरदर्शिता तथा आचारसंहिता की आवश्यकता थी, उसकी रही-सही भूमिका गढ़ी जानी बाकी थी. समय इन सबको एक बार फिर अपनी कसौटी पर परखने की तैयारी कर चुका था.
उन दिनों इंग्लैंड में संस्था ओं के पंजीकरण के लिए ‘फ्रैंड्स सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट-1829’ नामक अधिनियम प्रभाव में था, जिसमें सन 1834 में संशोधन भी हो चुका था. अधिनियम के अंतर्गत म्युचुअल फंड्स की स्थापना के लिए संस्था गठित करने का प्रावधान था. उस अधिनियम की घोषणा के समय इंग्लेंड सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई थी. क्योंकि सरकार की निगाह में सहयोगी संगठनों को बढ़ावा देने के लिए वह एक आदर्श व्यवस्था थी, जिसमें पहले से चले आ रहे प्रावधानों, परिवर्तनों तथा कानूनी सुधारों को भी सम्मिलित किया गया था. अठारह सौ उनतीस में जब वह अधिनियम मूल रूप में लागू हुआ था, उस समय तक समितियों का गठन प्रायः आर्थिक कार्यकलापों—यथा रकम उधार देने, जीवन बीमा, चिकित्सा बीमा आदि सामान्य कार्यों के लिए किया जाता था. उन दिनों लाभ का आशय केवल वित्तीय एवं मौद्रिक अर्जन तक सीमित था. सामाजिक लाभ जैसी कोई अवधारणा ही नहीं बन पाई थी. अतएव सामाजिक और रचनात्मक क्षेत्र में भी सहकारी समितियां उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं, इस प्रकार की कोई अभिकल्पना उस समय तक विद्वानों तथा प्रशासन के मानस में नहीं बन पाई थी. सरकार पर बदलाव के लिए चैतरफा दबाव बना हुआ था. डा॓. विलियम किंग के समाचारपत्र ‘दि को-आ॓पेरटर’ का जनता पर प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था. इस समाचारपत्र का पहला अंक 1 मई 1828 को निकला था और उसके बाद से लगातार यह लोगों में सहकारिता के प्रति चेतना जगाने का काम कर रहा था. उसी की प्रेरणा से इंग्लेंड में पहली सहकारी समिति की स्थापना हुई, सन 1830 में, नाम था—रोशडेल फ्रेंडली को-आ॓परेटिव सोसाइटी. चूंकि मजदूरों को वेतन मासिक या साप्ताहिक आधार पर मिलता था. अतएव समिति में सदस्यों को उनके दैनिक उपयोग की वस्तुएं उधार बेची जातीं थीं. नियम यह बनाया गया था कि वेतन मिलते ही मजदूर समिति का उधार लौटा कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा. मगर वक्त के साथ सबकुछ गड़बड़ाने लगा. कुछ मजबूरी के कारण तो कभी जानबूझकर, सदस्य लिया गया उधार लौटाने से आनाकानी करने लगे. आखिर भारी घाटे के कारण वह समिति बंद कर देनी पड़ी. अठारह सौ चौंतीस में पहली बार व्यवस्था के स्तर पर क्रांतिकारी सुधार देखने में आया. यद्यपि उन सुधारों का पूरी तरह से लाभ उठाने के लिए जनमानस पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाया था. इस कारण नए सुधारों की उपयोगिता का पूर्णतः मूल्यांकन शायद उन दिनों संभव नहीं था. उन दिनों सरकार ने समिति पंजीकरण अधिनियम में एक और संशोधन किया था, जिसके आधार पर लाभ (Benefits) की परिभाषा को किसी भी प्रकार के अनुलाभों तक विस्तृत कर दिया गया था. नए अधिनियम के अंतर्गत किसी भी विधिमान्य लाभ की प्राप्ति के लिए समिति का गठन किया जा सकता था.7
अधिनियम में हुए कानूनी सुधार ने भी रोशडेल पायनियर्स को एक बार पुनः संगठित होकर उस अधिनियम का लाभ उठाने की प्रेरणा दी थी, जिसमें उन्हें आशातीत सफलता प्राप्त हुई. सबसे पहले जो लोग समिति के रूप में आगे आए उनकी कुल संख्या अठाइस थी. वे सभी रोशडेल में काम करने वाले बुनकर परिवारों से संबद्ध साधारण मजदूर थे. उससे पहले भी मिल मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए आंदोलन कर चुके थे. उनमें उत्पे्ररक शक्ति की भूमिका निभाने वालों में प्रमुख—चार्ल्स हावर्थ, अब्राहम ग्रीनवुड, जा॓न हिल्टन, डेविड ब्रूक तथा विलियम कूपर.
सहकारिता आंदोलन के उन्नायक महान अठाइस बुनकर
जेम्स स्मिथ, जा॓न स्क्राक्राफ्ट, चार्ल्स हावर्थ, जा॓न हिल, विलियम कूपर, जा॓न हा॓ल्ट, डेविड ब्रूक, जेम्स स्ट्रेंडिंग, जा॓न का॓लियर, जेम्स मनोक, सेम्युअल एसवर्थ, जोसेफ स्मिथ, विलियम मलेल्यु, विलियम टेलर, जा॓र्ज हीले, राबर्ट टेलर, मिल्स एस्वर्थ, बैजांमिन रूडमेन, जेम्स डेली, जेम्स विलकिंसन, जेम्स ट्वीडले, जा॓न गार्सीड, सेम्युअल ट्वीडले, जा॓न बेंट, जा॓न केरसा॑, एन ट्वीडले, जेम्स मेडन, जेम्स बेम्फोर्ड (स्रोत: George Jacob Holyoake ‘The Rochdale Pioneers’)
मिल्स असवर्थ को समिति का पहला अध्यक्ष बनाया गया, परंतु, समिति के गठन में चार्ल्स हावर्थ का योगदान अविस्मणरीय था. समिति के नियमों की अभिकल्पना में उसकी भूमिका मुख्य थी. उन सब के सम्मिलित प्रयासों से दि ‘रोशडेल इक्वीट्ेवल पायनियर्स सोसाइटी’ (Rochdale Equitable Pioneers Society) की नींव रखी गई, जिसने आगे चलकर उपभोक्ता सहकारी आंदोलन के क्षेत्र में अनेक कीर्तिमान हासिल किए और सहकारी आंदोलन की मुख्य प्रेरक बनी. समिति के संस्थापक सदस्यों को आगे चलकर ‘ख्यातिलब्ध अठाइस’ (Famous twenty-eight) कहकर उनकी सहकार भावना का सम्मान किया जाता है.
चार्ल्स हावर्थ
चार्ल्स हावर्थ ‘दि रोशडेल इक्वीटेवल पायनियर्स सोसाइटी’ के विधान का प्रमुख वास्तुकार था. उसी ने समिति के विधान की रूपरेखा गढ़ी थी. अतएव उसको हम टोडलेन में स्थापित पहली सहकारी समिति का प्रमुख नीतिकार, अभिकल्पक, विचारक, उत्प्रेरक आदि मान सकते हैं. पेशे से साधारण मजदूर हावर्थ कपड़ा बुनने के कारखाने में धागा डालने का कार्य (Warper) करता था. उसकी आस्था समाजवादी विचारों में थी. हावर्थ, राबर्ट ओवेन के विचारों से भी प्रभावित था. उसको विश्वास था कि ओवेन के विचारों पर चलकर एक नए समानता पर आधारित समाज का गठन संभव है. मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए चार्ल्स ने कई आंदोलनों में सहभागिता की थी. उस समय तक कार्य के घंटे तय नहीं थे. कारखाना मालिक एक ही दिन में सोलह से अठारह घंटे तक काम लेते थे. हावर्थ ने इस मुद्दे पर सक्रियता दिखाते हुए दैनिक कार्यघंटों को दस घंटे तक सीमित करने के लिए लाए गए ‘दस घंटा अधिनियम’ के पक्ष में कई सभाएं कीं. हालांकि उस समय बहुत से मिल मजदूर इस संशोधन विधेयक के पक्ष में नहीं थे और इसे मालिकों तथा कामगारों के बीच का मुद्दा मानते हुए किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे. बावजूद इसके हावर्थ उस बिल के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लंदन भी गया था तथा हाउस आॅफ कामॅन में बिल पर चल रही बहस के दौरान उपस्थित भी रहा. उसका प्रशासन और सरकार पर असर पड़ा. ‘रोशडेल इक्वीटेवल पायनियर्स सोसाइटी’ उसका पहला प्रयास नहीं था. ओवेन से प्रभावित होकर हावर्थ ने सन 1830 ईस्वी में एक समूह का गठन किया था, जिसका नेता वह स्वयं था.
हावर्थ का सपना था कि संगठित शक्ति के द्वारा सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति की जाए, जिससे लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार की संभावना बढ़े. अपने सपने को सच में परिणित करने के लिए हावर्थ ने रोशडेल के टोड लेन नामक स्थान पर किराये की दुकान का प्रबंध किया था. वस्तुतः वह पुराना गोदाम था, जो वर्षों से खाली पड़ा था. उसका पता था—15, टोड लेन, रोशडेल. दुकान का किराया 10 पाउंड वार्षिक तय किया गया. दुकान को उन्होंने ‘को-आ॓परेटिव शा॓प’ का नाम दिया था. सहकारी समिति के लाभ को लगाई गई पूंजी के अनुपात में सदस्यों के बीच बंटवाने का विचार सहकारिता को उसी की देन है. व्यवसाय को ढंग से चलाने के लिए हावर्थ ने कुछ नियम भी बनाए थे. उनके अनुसार सदस्य उस दुकान से उधार माल खरीद सकते थे. उधार का भुगतान एक सप्ताह के बीच किया जाना तय था. प्रारंभ में सदस्यों का उपने उस सहयोगी उपक्रम के प्रति विश्वास और उत्साह बने रहे. लेकिन धीरे-धीरे उस व्यवस्था की कमजोरियां सामने आने लगीं. क्योंकि बहुत से सदस्य निर्धारित तिथि पर भुगतान नहीं कर पाते थे. और इस तरह उधार धीरे-धीरे बढ़कर एक विशाल रकम का रूप ले चुका था. उसमें से बहुत-सी राशि डूबती भी जा रही थी. उस दौरान हावर्थ को अपनी एक और भूल का भी अनुभव हुआ. उसके द्वारा उस दुकान के लिए बनाए गए नियम मौखिक थे, उनका लिखित प्रारूप न होने के कारण समिति का उधार न चुकाने वाले सदस्यों को अदालत के जरिये चुनौती नहीं दी जा सकती थी. फिर जैसा की तय था, हावर्थ को उस प्रयास में भारी नुकसान का सामना करना पड़ा. पहला सहकारी भंडार बामुश्किल दो वर्ष ही चल पाया. भारी घाटे के कारण उसे बंद कर देना पड़ा. योजना असफल हो जाने के कारण लोगों ने हावर्थ का खूब मजाक बनाया था. दुकानदारों का कर्ज लौटाने में उसको काफी नुकसान भी हुआ था. ऐसे में कोई और होता तो उस प्रयास को दोहराने का शायद फिर कभी प्रयास ही न करता. भूलकर भी संगठन और सहकार का नाम न लेता. लेकिन हावर्थ तो संकल्प का धनी था. समाज को बदलने के लिए कृतसंकल्प! पहला सहकारी भंडार बंद हो जाने का उसे दुःख था; और गहरा क्षोभ भी.
उधर रोजमर्रा की वस्तुओं में भारी मि लावटी से मजदूरों में अनेक बीमारियां बढ़ती जा रही थीं. सरकार पूंजीपतियों की समर्थक थी, इस कारण उससे किसी प्रकार की उम्मीद करना भी व्यर्थ था. ऐसे में एक ऐसे उपभोक्ता भंडार की अत्यंत आवश्यकता थी, जहां पर मजदूरों को खाने-पीने की वस्तुएं शुद्ध एवं उपयुक्त मूल्य पर प्राप्त हो सकें. उसका पिछला प्रयोग असफल हो चुका था. नई शुरुआत कैसे की जाए, वह रात-दिन इसी सोच में रहता. दुबारा घाटा सहने के लिए न तो वह तैयार था, न कोई उस अवस्था में साथ देने वाला था. मित्रगण भी तब तक साथ देने से बचते, जब तक लाभ की सुनिश्चितता न हो. वह सोचता था कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे सदस्यों को उनके द्वारा खर्च किए गए धन के अनुपात में लाभ मिलता रहे. उसने यह भी फैसला किया कि पिछली गलतियों को दोहराने से बचेगा. लेकिन वह राह कैसी हो, दुबारा गलतियां न हों, इसके लिए कौन से उपाय किए जाएं, यह समस्या उसको रात-दिन मथती रहती थी. और फिर सचमुच स्वप्नदृष्टा हावर्थ को एक रात सपने से ही राह मिली. एक रात हावर्थ देर तक जागा. चिंता के कारण उसको नींद आ ही नहीं रही थी. वह सहकारी प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहता था. ‘दस घंटा अधिनियम’ के विरुद्ध आंदोलन करते समय कुछ नए साथी बने थे. वे उसका साथ देने को तैयार थे, किंतु दुबारा नुकसान की संभावना से ही वह व्यग्र हो जाता था. लाभ की सुनिश्चितता को बढ़ाने की कोई भी युक्ति उसकी समझ में नहीं आ रही थी. मगर उस रात जैसे कमाल हुआ. वह अचानक उठ कर बैठ गया. पत्नी बराबर में ही सो रही थी. उससे लगभग बेखबर, अपने ही एक पुरखे आर्कीमिडीज की भांति नए विचार के स्वागत में हावर्थ चिल्लाया— ‘मैंने ढूंढ लिया…मैंने हल ढूंढ लिया.’8
हावर्थ के सपने में उसके अठाइस साथी और सम्मिलित हो गए. प्रत्येक ने निर्णय लिया कि वे प्रति सप्ताह कम से कम दो पैंस की रकम जमा करेंगे. उन सभी का जीवन संघर्षशील था. इसलिए प्रति सप्ताह दो पैंस जुटा पाना भी उनके लिए आसान नहीं था. कुछ साथियों को उसकी पिछली असफलता याद थी. उन्हें लगता था कि यदि नया प्रयास भी असफल हुआ तो इससे उनकी मामूली जमापूंजी का नुकसान संभव है. इसीलिए हावर्थ को उनके प्रारंभिक विरोध और असहयोग का सामना करना पड़ा. ऐसे समय पर हावर्थ ने चतुराई और राजनीति का सहारा लिया. उसने दो पैंस प्रति सप्ताह अग्रिम राशि देने के लिए प्रबंधकों पर दबाव डालना प्रारंभ कर दिया, जिसके पूरा न होने पर उसने हड़ताल और काम छोड़कर जाने की धमकी देना शुरू कर दिया. दो पेंस एडवांस मामूली रकम थी. उसके लिए कारखाना मालिक हड़ताल को न्योता नहीं देना चाहते थे. परिणाम यह हुआ कि कई कारखाने कामगारों के समर्थन में आ गए. कहते हैं कि जहां चाह वहां राह. जहां संकल्प वहां सफलता. कुछ की दिनों में सामूहिक जमाराशि अठाइस पाउंड तक पहुंच गई. रकम बहुत ज्यादा नहीं थी. मगर इतनी थी कि उससे वे अपने एक और सपने में रंग भरने का प्रयास कर सकें. चार्ल्स हावर्थ को अपने पिछले अनुभव की याद थी. साथ में पिछले सिस्टम की कमजोरियां भी. उसके अनुभव को देखते हुए सदस्यों की ओर से नई समिति की नियमावली तैयार करने की जिम्मेदारी उसी को सौंपी गई थी. हावर्थ ने उस दायित्व का भली-भांति निर्वहन किया. पिछले संगठन की कोई लिखित नियमावली न होने के कारण, सदस्यों को नियमों के पालन के लिए बाध्य कर पाना कठिन था. इस बार हावर्थ ने समिति के गठन से पूर्व ही एक विस्तृत नियमावली तैयार की थी, जिसको 24 अक्टूबर 1944 को पंजीयक फ्रैंडली को-आॅपरेटिव सोसाइटी के कार्यालय से पंजीकृत भी करा लिया गया. नई समिति का नाम रखा गया—‘रोशडेल इक्वीटेवल पायनियर्स सोसाइटी’. पिछले अनुभवों के सबक लेते हुए हावर्थ ने समिति के उपभोक्ता भंडार से की गई खरीद के अनुपात में सदस्यों को नकद लाभांश देने का प्रावधान किया था, जिसे बाद में बनने वाली सभी सहकारी समितियों में एक आधारसिद्धांत के रूप में मान्यता मिली. उसके द्वारा समिति के विधान में की गई नई व्यवस्थाएं आगे चलकर सहकारिता आंदोलन की रीढ़ बनीं. हावर्थ के निकट सहयोगी, मित्र और समिति के महत्त्वपूर्ण सदस्य, विलियम कूपर ने भी माना कि सदस्यों के बीच लाभ के विभाजन का विचार हावर्थ की ही देन था.
हावर्थ का जन्म सन 1814 में हुआ था. उसके मित्र प्यार से उसको ‘दि ला॓यर’ कहा करते थे. वह होलसेल कंज्यूमर सोसाइटी का आजन्म सदस्य भी था. उसकी सेवाओं को देखते हुए बाद में उसे इस समिति का अध्यक्ष भी बनाया गया. जो भी हो, हावर्थ का परिश्रम सफल रहा और रोशडेल पायनियर्स का काम चल निकला. 25 जून, 1868 को जब उसकी मृत्यु हुई, सहकारिता आंदोलन पूरे यूरोप में फैल चुका था. उसे हेवुड (Heywood) नामक स्थान पर दफनाया गया. हावर्थ की मृत्यु पर उसको श्रद्धांजलि देते हुए विलियम कूपर ने कहा था—
‘अपने जीवन में वह दूसरों के सदैव काम आनेवाला अतिसंवेदनशील नागरिक, धर्म के मामले में सर्वथा मुक्त विचारक, सामाजिक तथा राजनीतिक सरोकारों के समय सतत प्रगतिशील तथा लोककल्याण के लिए लगातार काम करने वाला एक महान समाज सुधारक था. वह एक अच्छा पति और पिता, सच्चा तथा हितैषी मित्र था.’9
जेम्स स्टेंड्रिंग
जेम्स स्टेंड्रिंग (James Standring) भी मलमल के कारखाने में बुनाई का कार्य करता था. वह प्रगतिशील विचारों को मानने वाला, एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता था. मजदूरों की आर्थिक सामाजिक दशा में सुधार के लिए वह सदैव समर्पित रहता था. राबर्ट ओवेन के कार्यों के प्रशंसक जेम्स का मानना था कि उसकी तरह दूसरे उद्यमियों को भी श्रमिक-कल्याण के कार्यों के लिए खुलकर सामने आना चाहिए. उसमें नेतृत्व की क्षमता थी और वह श्रमिकों को अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए सतत प्रेरित करता रहता था. रोशडेल में जब कारखानों में दैनिक कार्यघंटों में कमी लाने के लिए ‘दस घंटा अधिनियम’ के पक्ष में मजदूरों ने आंदोलन की शुरुआत की तो जेम्स ने न केवल उस आंदोलन का खुलकर समर्थन किया, बल्कि बल्कि सचिव के पद पर रहकर उसके आंदोलनकारियों के नेतृत्व में जोर-शोर से हिस्सा भी लिया. 1843-44 के बीच श्रमिकों ने अग्रिम वेतन के भुगतान के पक्ष में हड़ताल की तो वह एक बार फिर उनके समर्थन में उतर आया, हालांकि इस बार वह हड़ताल लगभग असफल सिद्ध हुई थी. इसी बीच जेम्स को सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम में सरकार द्वारा किए गए संशोधन की जानकारी मिली. उसने तत्काल फ्रैंडली सोसाइटी अधिनियम की प्रति मंगाकर उसका अध्ययन किया. उसको लगा कि मजदूरों को संगठित करने, उनके अधिकारों की रक्षा तथा उनके लिए कल्याण-कार्यक्रम प्रारंभ करने की दिशा में वह अधिनियम उपयोगी हो सकता है.
रोशडेल इक्वीटे्वल पायनियर्स सोसाइटी के गठन के लिए मजदूरों को प्रेरित करने वालों में जेम्स स्टेंड्रिग सबसे आगे था. समिति का गठन हुआ तो जेम्स का नाम भी अठाइस संस्थापक सदस्यों में सम्मिलित था.
विलियम कूपर
रोशडेल इक्वीटे्वल पायनियर्स सोसाइटी के संस्थापक सदस्यों में से एक विलियम कूपर का जन्म सन 1822 में हुआ था. समिति द्वारा उपभोक्ता भंडार प्रारंभ किया गया तो उसका खंजाची विलियम कूपर को ही बनाया गया. इसके अतिरिक्त उसका कार्य समिति के रिकार्ड की देखभाल करना था. समिति से जुड़ने से पहले वह हैंडलूम के कारखाने में बुनकर का काम करता था. समिति के सदस्य के रूप में उसको एकाउंटस तैयार करनेकी जिम्मेदारी सौंपी गई. जिसको उसने अच्छी तरह से निभाया. इसका उसको लाभ मिला. आगे चलकर जब कोआ॓परेटिव होलसेल सोसाइटी आरंभ की गई तो कूपर को ही उसका अध्यक्ष चुना गया. कोआॅपरेटिव होलसेल सोसाइटी का कार्य सहकारी स्तर पर चल रहे उपभोक्ता भंडारों को सामान उपलब्ध कराना था. यह समितियां सीधे उत्पादक से वस्तुएं खरीदकर उन्हें सहकारी उपभोक्ता भंडारों तक पहुंचाने का कार्य करती थीं. इससे जहां उत्पादकों को अपने उत्पादों के लिए बाजार के लिए भटकना नहीं पड़ता था, वहीं समिति के भंडारों को भी अपेक्षाकृत सस्ती दरों पर माल उपलब्ध हो जाता था. राबर्ट ओवेन तथा विलियम किंग के विचारों से प्रभावित कूपर की सहकार के विचारों में बहुत आस्था थी. ग्र्रीनवुड की भांति कूपर की भी महत्त्वाकांक्षाएं थीं. वह भी मेहनती तथा अद्वितीय प्रतिभा का धनी था. सहकारिता और समाजवाद से जुड़े विचारों के प्रसार के लिए उसने कई स्तर पर काम किए. को-आ॓परेटिव होलसेल सोसाइटी के गठन के पीछे कूपर की काफी प्रेरणाएं थीं. उसके इस प्रयास से सहकारी समितियों के कार्य को संगठित करने की दिशा में मदद मिली. क्योंकि स्थान-स्थान पर तेजी से खुलते जा रहे उपभोक्ता भंडारों के लिए संभव न था कि वे सीधे उत्पादकों से माल मंगवा सकें. उनके इस कार्य को कोआ॓परेटिव होलसेल समितियां सुलभ बना देती थीं. इससे उत्पादकों में सहकारी संस्थाओं के प्रति आकर्षण पैदा हुआ. दूसरे बाजार की समस्या कम होने से उन छोटे उत्पादकों को भी आगे बढ़ने का अवसर मिला जो अभी तक बड़े उत्पादकों के सामने बाजार में टिक नहीं पा रहे थे. दूसरे उत्पादित माल की खपत की सुनिश्चितता होने के पश्चात लोग सहकारी समूहों के माध्यम से उत्पादकता के क्षेत्र में भी आगे आने लगे थे, जो उससे पहले कदापि संभव नहीं हो पा रहा था. इसके अतिरिक्त कूपर ने सहकारी बीमा समिति के गठन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. साथ ही आगे चलकर सहकारी कामगार समिति (Co-operative Workers Society) की स्थापना में भी उसका बहुमूल्य योगदान रहा. कूपर को सहकारिता के सैद्धांतिक पक्ष का भी पर्याप्त ज्ञान था. इस विषय पर अपनी पकड़ तथा अपने अनुभव का प्रदर्शन करते हुए उसने एक पुस्तक की रचना भी की. उस पुस्तक का शीर्षक है—हिस्ट्री आ॓फ दि रोशडेल डिस्ट्रिक्ट कोर्न मिल’. यह पुस्तक तत्कालीन इंग्लैंड के कारखानों में कामगारों की स्थिति को समझने का एक आदर्श माध्यम है. उससे यह भी पता चलता है कि औद्योगिकीकरण का वह दौर कितना अव्यवस्थित एवं श्रमिक-विरोधी था. विलियम कूपर का निधन 31 मार्च, 1868 को हुआ, उस समय उसकी आयु मात्र छियालिस वर्ष थी. विलियम कूपर को ऋद्धांजलि देते हुए सहकारिता के मुख्य समाचारपत्र ‘दि को-आॅपरेटर’ ने लिखा कि—
‘जैसी दिखाई देती थी, वह उसकी मौत नहीं थी. बल्कि वह पवित्र जीवन की ओर बहा ले जाने वाली दिव्य श्वांस थी. वह एक इंसान द्वारा देवताओं की महान नगरी में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश है, भले ही हम जैसे साधारण लोग उसको मौत का नाम देते रहते हैं.’10
छोटे से जीवन में बड़े कार्य कर जाने वाले दुनिया में जो गिने-चुने इंसान जन्मे हैं, विलियम कूपर का उन्हीं आदरणीयों में से एक है.
मिल्स एश्वर्थ
व्यवसाय से बुनकर मिल्स एश्वर्थ (Miles Ashworth) की ओवेन एवं लुईस ब्लेंक के विचारों में पूरी आस्था थी. लेकिन राजनीतिक रूप से वह एक चार्टिस्ट था तथा संगठन के कार्य में उसको प्रवीणता प्राप्त थी. रोशडेल इक्वीटेवल पायनियर्स सोसाइटी का सदस्य बनने से पहले उसने कुछ दिनों तक एक कारखाने में चौकीदार की नौकरी भी की थी. समिति के गठन के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने वालों में वह सबसे आगे था. इसलिए समिति के गठन के समय पहला अध्यक्ष मिल्स एश्वर्थ को ही बनाया गया. उसने अपने दायित्व का विधिवत निर्वाह किया. समिति का ही एक और सदस्य सेमुअल एश्वर्थ, मिल्स का ही बेटा था. मिल्स एश्वर्थ की मृत्यु 13 अप्रैल, 1868 को हुई, उस समय उसकी आयु 76 वर्ष थी. मिल्स को रोशडेल पायनियर्स के कब्रिस्तान में दफनाया गया था. सहकारी क्षेत्र उसके योगदान को भुला पाना संभव नहीं है.
जेम्स स्मिथ
अपने साथियों की भांति जेम्स स्मिथ भी ऊन छांटने के कारखाने में नौकरी करता था. वह एक समाजवादी विचारक था, जिसकी आंखों में रात-दिन आमूल परिवर्तन का सपना कौंधता रहता था. बहुमुखी प्रतिभा का धनी स्मिथ मेहनती भी खूब था. रोशडेल पायनियर्स के गठन के दौरान सदस्यों को उससे जोड़ने, उनके दिमाग में साहचर्य के प्रति अनुराग पैदा करने वालों में स्मिथ सर्वोपरि था. इसलिए समिति के गठन के समय से ही उसको महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं सौंपी जाती रहीं. वह समिति के कार्य में रात-दिन जुटा रहता था. उसकी सेवाओं को देखते हुए उसको निदेशक, अध्यक्ष, महासचिव, ट्रस्टी जैसे महत्त्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी सौंपी जाती रही, जिसका उसने भली-भांति निर्वाह किया. सदस्यों के बीच सहकार की भावना जगाने और शांति एवं सौहार्द कायम करने के लिए सतत कार्यशील रहने वाले जेम्स स्मिथ की मृत्यु मात्र 50 वर्ष की अवस्था में, 27 मई, 1869 को हुई. उसको रोशडेल के कर्बिस्तान में दफनाया गया. रोशडेल के उपभोक्ता भंडार को अपनी स्थापना के प्रारंभिक वर्षों में ही मिली अप्रत्याशित सफलता के पीछे जेम्स स्मिथ के परिश्रम का बहुत बड़ा योगदान था. विडंबना यह है कि जिस आंदोलन की नींव जमाने में स्मिथ का हाथ था, उसकी सफलता के बहुत कम आयाम वह अपने छोटे-से जीवन में देख सका. बावजूद इसके प्रारंभिक रोशडेल पायनियर्स के संस्थापक सदस्यों में उसका योगदान अविस्मरणीय था.
जा॓न स्क्राक्रा॓फ्ट
स्क्राक्रा॓फ्ट बहुत मामूली व्यक्ति था. फेरी लगाकर माल बेचने वाला. गरीब और सीधा-सादा. राजनीति में उसकी जरा भी रुचि नहीं थी. बावजूद इसके वह कुशल वक्ता था तथा लोगों को प्रभावित करने का गुर उसको आता था. उसका ज्ञान बहुआयामी था. लोग अक्सर उससे मिलने के लिए आते रहते थे. उस समय वे उससे स्थानीय मसलों के अलावा धर्म, राजनीति तथा सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते थे. वह देर रात तक उनके बीच बैठकर बात-चीत करता रहता था. उसकी बतकही का जादू कि लोग अपनी भूख-प्यास सबकुछ भुला देते थे. एक मंजे हुए विद्वान की भांति स्क्राक्रा॓फ्ट अपने सानिध्य में बैठे लोगों की प्रत्येक जिज्ञासा का समाधान करने की कोशिश करता. कभी-कभी बात बहस तक भी पहुंच जाती थी. कई बार धार्मिक मान्यताओं पर चर्चा प्रारंभ हो जाती थी. स्क्राक्रा॓फ्ट के पास गंभीर आलोचकीय दृष्टि थी, जो धार्मिक चर्चाओं के दौरान अक्सर मुखर हो जाती थी. वह धर्म में आडंबरवाद का घोर विरोधी था. अतएव धार्मिक चर्चाओं के दौरान अक्सर वह चर्च के आडंबरवाद की बखिया उधेड़ने लगता था. उस समय वहां पर उपस्थित धार्मिक रूप से आस्थावान व्यक्ति लंबी-लंबी बहसों पर भी उतर आते थे. लेकिन स्क्राक्रा॓फ्ट का धर्म संबंधी ज्ञान दार्शनिकता से लबरेज था. वह अपने आलोचकों की हर बात का तार्किक उत्तर देने का प्रयास करता.
इस तरह की बहसों में उसको हरा पाना असंभव था. वस्तुतः मानववादी होने के नाते स्क्राक्रा॓फ्ट की धर्म-संबंधी व्याख्याएं जनसामान्य के पक्ष में जाती थीं. जिन लोगों के बीच वह रह रहा था, उन्हें इसी प्रकार के जादुई नेतृत्व की आवश्यकता थी. वास्तव में उसकी विचारधारा मानवीयता के अनुकूल थी. इसलिए वह पास आए लोगों के साथ देर तक बहस कर सकता था.
जा॓न का॓लियर
प्रथम अठाइस के बीच जा॓न का॓लियर शायद सर्वाधिक सुशिक्षित सदस्य था. वह समाजवादी विचारधारा में आस्था रखने वाला एक प्रशिक्षित इंजीनियर था. का॓लियर के दादा, जा॓न का॓लियर(टिम बाबिन) स्वयं बहुत अच्छे लेखक थे. वे रोशडेल के निकटवर्ती स्थान मिलनरो के रहने वाला, लगभग बातूनी व्यक्ति थे. गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में उनका अच्छा दखल था. 1744 तथा 1750 के बीच उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की थी. उनकी शैली व्यंग्यात्मक थी. जिसका असर लंबा होता था. लोग उनकी ओर खिंचे चले आते थे—स्त्री और पुरुष दोनों. 1786 में उनकी मृत्यु हुई थी. उनके मजाकिया स्वभाव का अनुमान इस कविता से लगाया जा सकता है, जो उन्होंने अपनी मृत्यु के मात्र दस मिनट पहले लिखी थी. उनकी मृत्यु के उस कविता को उनके समाधिलेख के रूप में उनकी कब्र पर खुदवा दिया. कविता का आशय है—
‘यहां जा॓न अपनी नन्ही कविता के साथ लेटा हुआ है. उसके साथ गाल से गाल सटाए हुए. चौंकिए मत कि उनके बीच गहरा समझौता हो चुका है. अब न जा॓न को किसी शरबत की आवश्यकता है, न उसकी प्रेमिका को चाय की.’11
जा॓न का॓लियर पर अपने दादा की विचारधारा का असर पड़ा था. समाजवाद के प्रति अपनी आस्था के ही कारण वह रोशडेल पायनियर्स के संपर्क में आया. दादा की भांति जा॓न का॓लियर भी अद्भुत वक्तव्य कला का धनी था. रोशडेल पायनियर्स द्वारा उपभोक्ता भंडार की स्थापना से लेकर उसके आगे के प्रगति अभियानों में जा॓न का॓लियर का योगदान अत्यंत बहुमूल्य था. उसकी मृत्यु 24 नवंबर 1883 को हुई. उस समय उसकी आयु 75 वर्ष थी. उसको रोशडेल की कब्रगाह में ही दफनाया गया.
डेविड ब्रूक
डेविड ब्रूक पेशे से ब्ला॓क पेंटर तथा विचारधारा से चार्टिस्ट था. यहां हम बता दें कि इंग्लेंड में 1830 से लेकर 1840 के बीच राजनीतिक कार्यकर्ताओं का एक संगठन आंदोलनरत था. संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं की मांग आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप थीं. वे सत्ता में सभी की साझेदारी की मांग कर रहे थे. उनकी सबसे पहली मांग थी कि प्रत्येक नागरिक को वैद्य मतदान के आधार पर संसद में जाने का अधिकार होना चाहिए. प्रारंभ में सराकार को यह मांग बहुत नागवार गुजरी थी. परिणामस्वरूप अनेक चार्टिस्ट को सजा काटने के लिए आस्ट्रेलिया भेज दिया गया था. ‘चार्टिस्टस’ आंदोलनकारियों की मांग को आगे चलकर जान स्टुअर्ट मिल आदि व्यक्ति स्वातंत्रय के समर्थक विचारकों का समर्थन मिला, जिससे वह आंदोलन नए सिरे और नए नाम से आगे बढ़ सका. डेविड ब्रूक ईमानदार तथा उत्साही कार्यकर्ता था. उसकी मेहनत एवं लगन को देखते हुए उसको समिति के उपभोक्ता भंडार के लिए सामान की खरीद का दायित्व सौंपा गया था. वह एक जिम्मेदारी का काम था. खासकर उन प्रारंभिक दिनों में जब उपभोक्ता भंडार को ‘बुनकरों की दुकान’ कहकर उससे जुड़े लोगों का मजाक उड़ाया जाता था. माल की खरीद के लिए ब्रूक को जगह-जगह जाना पड़ता था. वहां दुकानदार और उत्पादक आदि मिलकर ब्रूक का मजाक उड़ाते, उसको हतोत्साहित करने का प्रयास करते थे. ब्रूक बिना आपा खोये धैर्यपूर्वक अपने काम में लगा रहता था.
ब्रूक की आस्था समाजवादी विचारधारा में थी और वह चाहता था कि मजदूर वर्ग स्वावलंबी हो और बिना किसी की कृपा के, सिर्फ अपनी मेहनत द्वारा विकास करें. वह अपनी ठीक-ठाक नौकरी छोड़कर समिति के साथ जुड़ा था और कहीं भी सात से आठ शिलिंग प्रतिदिन बहुत आसानी से कमा सकता था. लेकिन रोशडेल पायनियर्स का कार्य उसने केवल अपनी आत्मतुष्टि के लिए, यह कहकर स्वीकारा था कि जब तक समिति अपने प्रत्येक सदस्य को कम से कम तीन पेनी प्रतिघंटे की दर से वेतन देने में समर्थ नहीं हो जाती, तब तक वह बिना किसी मौद्रिक लाभ के अपनी सेवाएं प्रदान करता रहेगा. उसने कई वर्ष तक समिति की सेवा की. पांच वर्ष तक वह रोशडेल पायनियर्स के उपभोक्त भंडार में खरीद विभाग का कार्यालय अध्यक्ष बना रहा. उसने अपना सारा जीवन भीषण आर्थिक अभाव के बीच बिताया था. ब्रूक का निधन 79 वर्ष की अवस्था में, 24 नवंबर 1882 को हुआ. लेकिन उन सुंदर, सजीले और महकीले फूलों की भांति जो गुमनामी के अंधियारे में खो जाने को अभिशप्त होते हैं, ब्रूक द्वारा समिति की कामयाबी तथा सदस्यों के बीच आपसी सौहार्द एवं सामाजिकता बनाए रखने के लिए किए गए कार्य को लगभग विस्मृत कर दिया गया.12
अब्राहम ग्रीनवुड
चार्ल्स हावर्थ की भांति अब्राह्म ग्रीनवुड (Abraham Greenwood) भी बुनकर परिवार से संबद्ध था. उसका जन्म 1824 में हुआ था. पिता कंबल बनाने का कार्य करते थे. स्वयं ग्रीनवुड ने भी छबीस वर्षों तक ऊन की छंटाई का कार्य किया था. वह कई वर्षों तक चार्टर एसोसिएशन का सचिव रह चुका था. 1848 में रोशडेल पायनियर्स से जुड़ने से पहले वह ‘पीपुल्स इंस्टीट्यूट’ में पुस्कालयाध्यक्ष था. वह विलियम किंग तथा राबर्ट ओवेन के कार्य से प्रभावित था. उन्हीं के संपर्क में आने से सहकारी आंदोलन में उसकी आस्था जगी थी. इसलिए रोशडेल पायनियर्स से जुड़ने के साथ ही उसने सहकारिता के विस्तार के लिए पूरे मनोयोग से कार्य किया था.
ग्रीनवुड की अध्यापन में रुचि थी, इसीलिए समिति द्वारा प्रदत्त दायित्वों के अतिरिक्त वह बाकी सदस्यों को पढ़ाने में भी रुचि लेता था. सप्ताह के अंत में एक दिन वह समिति के सदस्यों को पढ़ाने का काम करता था. राजनीति अर्थशास्त्र से उसका विशेष लगाव था. अब्राह्म ग्रीनवुड की मेधा एवं सहकार के प्रति उसके सक्रिय लगाव के कारण ही उसको रोशडेल सोसाइटी आ॓फ इक्युटेवल पायनियर्स के संस्थापक सदस्यों में शामिल किया गया था. समिति के सदस्य के रूप में ग्रीनवुड ने सौंपे गए दायित्वों का निर्वाह पूरी लग्न एवं ईमानदारी से किया. उसके माध्यम से समिति ने अपनी कई विस्तार योजनाओं को कामयाबी के साथ पूरा किया. इसलिए आगे चलकर जब कंज्युमर होलसेल सोसाइटी की स्थापना की गई तो उसकी अध्यक्षता के लिए ग्रीनवुड को ही चुना गया. वह रोशडेल कार्न मिल का संस्थापक और अध्यक्ष भी रहा. सन 1874 से 1898 के बीच उसने रोशडेल होलसेल सोसाइटी के कैशियर और प्रबंधक जैसे दायित्वों का भी वहन किया. इन सारी जिम्मेदारियों को संभालकर ग्रीनवुड ने सहकारिता के विचारों के प्रति निष्ठा के साथ अपनी प्रबंधन क्षमता का भी परिचय दिया था. इसीलिए समिति के भीतर उसको एक से बढ़कर एक, महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जाती रहीं. आगे चलकर रोशडेल पायनियर्स ने जब बीमा व्यवसाय के क्षेत्र में प्रवेश किया तो सर्वसम्मिति से ग्रीनवुड को ही बीमा कंपनी की बागडोर सौंपी गई. उसको नवगठित बीमा कंपनी का अध्यक्ष बनाया गया. सहकारिता के प्रचार-प्रसार उसके विचार एवं सिद्धांतों को आमजन तक ले जाने तथा लोगों को उसके प्रति प्रेरित करने के लिए उसने सहकारी समाचार नामक संचार सेवा की शुरुआत की थी. उसने को-आ॓परेटिव न्यूज सेवा के अध्यक्ष का दायित्व भी संभाला. वह पचीस वर्षों तक न्यूज पेपर सोसाइटी का अध्यक्ष भी रहा. उस पद पर रहते हुए भी उसने सहकारिता आंदोलन को आगे ले जाने का कार्य किया. ग्रीनवुड की समाजवादी विचारधारा में आस्था थी. लोककल्याण एवं समाजसेवा से जुड़े कार्यों में उसका मन लगता था. उसकी मृत्यु सन 1911 में हुई. सहकारिता आंदोलन विश्वपटल पर अगर अपनी पहचान बना पाया तो उसके पीछे ग्रीनवुड जैसे समर्पित को-आ॓परेटरों का भी भारी योगदान रहा है.
जॅान हिल्टन
जॅान हिल्टन, विलियम कूपर की भांति हालांकि रोशडेल पायनियर्स के संस्थापक सदस्यों में से नहीं था. परंतु समाजवादी-सुखवादी विचारधारा को लोकप्रिय बनाने वालों में उसका योगदान अविस्मरणीय है. उसका जन्म सन 1824 ईस्वी में हुआ था. वह एक प्रतिबद्ध विचारक तथा समाज में आमूल परिवर्तन का पक्षधर आंदोलनकर्मी था. मजदूरों पर उसका प्रभाव था. उनकी समस्याओं के निदान के लिए वह सतत प्रयासरत रहता था. इसीलिए 1864 में जब रोशडेल होलसेल को-आ॓परेटिव सोसाइटी प्रारंभ की गई तो जा॓न हिल्टन को उसकी सदस्यता के लिए आमंत्रित किया गया. जा॓न हिल्टन ने अपने दायित्व को खुशी-खुशी निभाया. वह मेडिल्टन एवं टांग सोसाइटी का भी संस्थापक सदस्य रहा. वह एक सफल लेखक था. वह पूंजीवाद के बढ़ते वर्चस्व को सामान्यजन के हितों के प्रतिकूल मानता था. विशेषकर उसकी पूंजीवाद की वह विचारधारा जिसके आधार पर वह मनुष्य को महज एक कामोडिटी मानकर आचरण करती है, जिसकी उपयोगिता दूसरी कामोडिटीज के सेवन की मात्रा से तय होती है. अपने लेखों में हिल्टन इस पूंजीवादी प्रवृत्ति का जमकर विरोध किया था. उसकी विचारधारा माक्र्सवादियों से मेल खाती थी. 1899 में जब उसकी मृत्यु हुई तब तक सहकारिता का विचार बहुत आगे बढ़ चुका था.
मजदूरों की मुख्य समस्या थी—घटिया, मिलावट-युक्त खाद्य सामग्री की उपलब्धता, वह भी औने-पौने दामों में. स्पष्ट है कि रोशडेल के उन मजदूर बुनकरों ने अपनी रोजमर्रा की परेशानियों से मुक्ति के उपाय के रूप में सहकारिता को चुना था. समिति के माध्यम से— ‘उनका तात्कालिक लक्ष्य था—
उचित मूल्य पर श्रेष्ठतर गुणवत्ता के भोज्य-पदार्थों की उपलब्धता, साथ ही कुछ रोजगार तथा सहकारी प्रयासों द्वारा होने वाले लाभ के माध्यम से एक समुदायिक इकाई की स्थापना, जहां पर रहने और काम करने की स्थितियां अपेक्षाकृत बेहतर हों. दूसरे शब्दों में वे एक शैतानी मिल के भीतर अपने लिए नए तीर्थ (येरोशलम) का निर्माण करना चाहते थे.’13
समिति के सदस्यों में चार्ल्स हावर्थ आदि कुछ तो पुरानी रोशडेल फ्रैंडली को-आ॓परेटिव समिति के सदस्य रह चुके थे, जबकि कुछ सदस्य डा॓. विलियम किंग के समाचार पत्र ‘दि को-आ॓परेटर’ के प्रभाव से उससे जुड़े थे. कुछ चार्टिस्ट आंदोलन से ही एक-दूसरे के साथ थे जबकि कुछ मद्यनिषेद्ध आंदोलनों के दौरान आपस में जुड़े थे. ये सभी अपनी परिवर्तनकारी निष्ठा के कारण समिति के संपर्क में आए थे. पेशे के अनुसार भी उनमें विभिन्न व्यवसायों से संबंधित, यथा—दर्जी, मोची, जा॓इनर, केबीनेट बनाने वाले, इंजीनियर आदि सम्मिलित थे. तथापि उनमें आधे से अधिक सदस्य कपड़ा उद्योग से जुड़े साधारण कारीगर थे. वे सभी लगभग एकसमान स्थितियों से गुजरे हुए, इसलिए उनकी समस्याएं भी एक जैसी ही थीं. इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन अठाइस सदस्यों में न केवल एकता एवं समर्पण का भाव था, बल्कि अपने लक्ष्य के लिए पूरी निष्ठा एवं त्याग के साथ जुटे रहने का साहस भी था. बावजूद इसके लोगों का समर्थन पाने के लिए उन्हें काफी दिनों तक अनेक कठिनाइयों से गुजरना पड़ा था. उस महत्त्वपूर्ण अवसर को शब्दों में चित्रित करते हुए जार्ज हा॓लस्की, जो रोशडेल पायनियर्स की प्रारंभिक टीम का सदस्य रह चुका था, ने लिखा है— ‘सहकार को समर्पित कुछ व्यक्ति अंतिम निर्णय करने की चाहत में गोदाम के सीलन और उदासी भरे कक्ष में उत्साहपूर्वक मिले. कि जैसे कोई संसद के विरुद्ध जमा हो रहे षड्यंत्रकारी हों. वे अपनी तैयारी दिखाते हुए इस बात पर बहस कर रहे थे कि अंत में दुकान बंद करने की जिम्मेदारी कौन संभालेगा. उनमें से एक इस काम को पसंद नहीं करता था, तो दूसरे को दुकानदारी के काम से ही नफरत थी. लेकिन उनमें से किसी के पास भी आगे बढ़ने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं था. उनमें देर तक कड़वी बहसबाजी चलती रही. लेकिन कुछ देर बाद पूरी टोडलेन उनके ठहाकों से गूंज रही थी.’20 ध्यातव्य है कि उन मजदूरों की दुर्दशा का मुख्य कारण उनकी गरीबी थी. शिक्षा एवं सांस्कारिक प्रशिक्षण का भी उनमें अभाव था. तथापि यह भी सत्य है कि उस समूह को सहकारिता के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्ष की पूरी जानकारी थी. कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनके जुड़ाव के प्रमुख कारण आर्थिक न होकर नैतिक थे. प्रकारांतर में इसीलिए सहकार को सभी राष्ट्रों एवं धर्मालंबियों ने आंदोलन के रूप में अपनाने पर जोर दिया, क्योंकि उसमें नकार के स्थान पर समर्थन एवं सहयोग से काम लिया जाता था. उनका संगठन भूख के बजाय आदर्शवाद से प्रेरित था.21 सहकार उन्हें किसी एक व्यक्ति के कल्याण का न सोचकर पूरे समूह के कल्याण का आश्वासन देता था, इसलिए सामूहिकता की भावना को भी बढ़ाता था. हालांकि इसी तरह की नैतिक व्यवस्थाएं पूर्वी एवं पश्चिमी धार्मिक-नैतिक शास्त्रों में भी मौजूद रही हैं, परंतु पूंजीपतियों ने अपने प्रभाव एवं धन के दुरुपयोग द्वारा उन सभी नैतिक व्यवस्थाओं को शोषण के हथियार के रूप में प्रयुक्त करना आरंभ कर दिया था. सहकार चूंकि प्रत्येक व्यक्ति को सहभागिता के साथ संवाद का अवसर भी उपलब्ध कराता था, इसलिए सहकारिता को उन परिस्थितियों में आदर्श माना गया था.
ओमप्रकाश कश्यप
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